पतझड़ संसार

किसी की चाहत में बर्बाद हो गए,

अपने ही खुशियों के खिलाफ हो गए

चले थे हम खुशियाँ देने सबको,

आज खुद हम अपनी खुशियों के मोहताज हो गए ।

जिंदगी न रौशन हुई , न आयी वो वक्त-ये-बहार,

हम तन्हा यूँ गुंजन करते रहे, सब चले गए हो गया पतझड़ संसार। 

शाम की धुंध क्यों आज सुबह भी कायम है

हर दिन में ते रात सी तन्हाई क्यों है

रुख तो था बस प्यार ही प्यार का,

तो ये ज़िन्दगी में आई ऐसी जुदाई क्यों है

हम तो थे हिमायत सभी के मेरे राम

हम ही लूट गए, तेरे इस वस्त्र की ऐसी सिलाई क्यों है,

ज़रा मुझ पर भी तो उपकार कर,

निकाल ले मुझे इस पतझड़ संसार से,

प्रफुल्लित होती थी बस बहार-ए-खुशबु

तो आज ऐसी बेवफाई क्यों है???

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